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Rose Exihibition-2010, Bhopal

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Friday, December 5, 2008

एक सवाल



आजकल,
हर आईना पूछता है मुझसे,
कि वो तेरा हमराज कहाँ गया!
जो कभी तेरे काँधे के कोनों से,
तो कभी तेरे बाहों के घेरे से
मचल कर झाँका करता था!

मन्दिरों की सीढियाँ पूछती हैं मुझसे
कि वो तेरा साथी कहाँ गया,
जो कभी तेरे साथ यहाँ बैठता था!

हर राह पूछती है मुझसे
कि वो तेरा हमसफर कहाँ गया,
जो तेरे साथ यहाँ से गुजरता था!

ये चाँद पूछता है मुझसे
कि वो तेरा हमनज़र कहाँ गया,
जिसकी नज़रों से
कभी तू मेरे नज़ारे देखता था!

दिन के उजाले पूछते हैं मुझसे
कि तेरा वो हमसाया कहाँ गया,
जो कभी तेरे आगे, कभी तेरे पीछे
तो कभी तेरे साथ साथ चलता था!

मेरी अंगुलियाँ पूछती हैं मुझसे
कि वो दाँतों से कुतरे छोटे नाखुनों वाले,
नन्हीं नाजुक अंगुलियों वाले,
हाथ कहाँ गए!
जिनके गरम कोमल निर्दोष स्पर्श
आज भी ज़िन्दा हैं तेरी हथेलियों में!


मेरी रातों के सन्नाटे पूछते हैं मुझसे,
कि वो तेरा हमज़ुबां कहाँ गया,
जिसकी पिछली सर्द रातों की फुसफुसाहट
आज भी गूंजती है तेरे कानों में!

वो कहते हैं
मैं अन्धेरों में चलता हूँ!

मैं पूछता हूँ
ये अन्धेरे मुझे किसने बख्शे...

Saturday, November 29, 2008

जीने की कोशिश



हर दिन एक जीने की कोशिश करता हूँ

अपने स्मृति के सीपियों से
तुम्हारी यादों के मोती चुनता हूँ.
अपने स्वपनों में कल्पना के ताने-बाने से
रचित दुनिया में इन मोतियों को सजाता हूँ.
जिस स्वपनिल संसार में
तुम जीना चाहती थी, पूरी एक ज़िन्दगी,
उड़ना चाहती थी, खुले आसमान में,
हँसना चाहती थी एक उन्मुक्त हँसी,
सोना चाहती थी एक बेफिक्र नींद
कहना चाहती थी अपने मन की बात,
बेबाक ढ़ंग से.
गुम होना चाह्ती थी
किसी की बड़ी सी बाँहों में,
करना चाहती थी किसी से प्यार
जो तुम्हारा है
बसाना चाहती थी एक संसार
जिसमें तुम्हारे सपने बसते थे...
सपनों के इस संसार को
रचने, बसाने, संवारने, सजाने की
एक कोशिश में हर दिन मर-मर कर जीता हूँ.
डरता हूँ सपना कहीं खत्म ना हो जाए.

जीने की कोशिश में मरना
मरने के डर से जीना
वक़्त कट रहा है, इन्हीं दो पंक्तियों के बीच...

जीवन है भ्रम का



जीवन है भ्रम का
सुख - दुख
आशाएं, अभिलाषाएं
रूप हैं सब इसकी।
मुक्ति व्यक्ति को मिल न सका
कभी इच्छाओं की लहरों में
भावनाओं के समुद्र में।
इच्छाओं ने है फंसाया
रिश्ते नातों के भंवर में।
कौन किसी का है हो सका
इस जग में
क्या कोई उसे है मिल सका
चाहा जिसे इस जग में ।
नहीं मिलता यहाँ चाहने से कुछ
भीख न मिलती प्यार की
माँगने से भी है नहीं कुछ मिलता
इस जग में है सब कुछ बिकता।
लगा लो मोल किसी का
है अगर गाँठ में मुद्रा।
पर,
प्रेम जो अपने भीतर से उपजे
किस बाज़ार में बिक पाए
क्या कोई उसका मोल लगाए
कितनी मुद्रा दे पाए ?
जीवन है भ्रम का
है प्रेम नहीं अलग इससे
जीवन में है प्रेम
मगर,
जीवन है भ्रम का...

अनदेखी हत्या



अब मैं हत्या करता हूँ
तुम्हारी उन भावनाओं की
जिन्हे मैनें पोषित किया था...

तुम्हारे उन विचारों की,
जो मेरे हृदय में संजोयी हुई हैं...

तुम्हारी उस स्मृति की,
जो अभी भी तुम्हारी उपस्थिति का एहसास कराती है...

तुम्हारी उस गन्ध की,
जो आज भी मुझे याद है...

तुम्हारे उस स्पर्श का
जो अभी भी मुझे सजीव लगता है...

तुम्हारे उस आगोश की
जो आज भी मुझे अपने लिए
सबसे सुरक्षित कोना जान पड़ता है...

तुम्हारे उस गोद की
जहाँ आज भी मैं अपनी चिर अनिद्रा में
निद्रामग्न हो जाता हूँ...

इसलिए,
अब मैं हत्या करता हूँ, अपनी
क्योंकि तुम अपने इन सभी रूपों में
काबिज हो, मेरी सांसों में
उनके अंतरालों में
मेरी स्मृतियों पर
और मेरे स्वपनों पर...

Sunday, November 16, 2008

एक चाहत


मैं चाहता हूँ कि
हम अगले जनम में
चिड़िया बन जाएं.
क्योंकि, तब हमारे पास
उड़ने के लिए इस अनंत
गगन की गहराइयाँ होंगी.
जहाँ हम साथ-साथ रह सकेंगे
साथ साथ दाना चुगने जा सकेंगे
अपना घोंसला बनाने के लिए
खर-पतवार और तिनके चुनने की
मशक्कत साथ साथ कर सकेंगे.
तब हमें किसी वैसे घर की
ज़रूरत नहीं पड़ेगी
जो घर कम,
गोदाम ज्यादा लगता है.
हमारे घोंसले यानि घर में
सिर्फ़ दो ही सामान रहेंगे,
तुम और मैं यानि हम.
सर्दियों में हम एक-दूसरे के लिए
कम्बल भी बन जाएंगे.
बारिश में खुले आकाश में
साथ साथ भीगते हुए घूमेंगे.
बारिश के बाद
सफेद बादलों से झरती धूप में
अपने फरों को सुखाएंगे.
तब तुम्हें भी कहीं जाने की जल्दी नहीं होगी,
और मुझे भी ऎसा नहीं लगेगा कि
बस आने वाले कुछ पलों बाद
तुम्हारा साथ छूटने वाला है
और तब हमारे पास
किसी सामाजिक मान्यताओं की
सीमा तोड़ने की बाध्यता भी नहीं होगी.
और तब हमारी नैतिकता पर
ना तो हम कोई सवाल उठाएंगे
ना ही कोई दूसरा...